विश्व के बदलते अयाम

19 वीं सदी के नवीन भारत ,विश्वपटल में छाप छोड़ता नया भारत,दुनिया के नई शक्तिओ का अगुआ भारत,एशिया का नया शेर भारत। परन्तु क्या हम कुछ ज्यादा ही लालची  हो रहे है? भारत का विश्व के अन्य राष्ट्रो के साथ रिश्तों से इनपे क्या प्रभाव पड़ता है। चलिए एक आकलन करते है।

शुरुआत करते है अपने पड़ोसियों से। किसी जमाने में ये देश ब्रिटिश राज का हिस्सा हुए करते थे। सर्वप्रथम बात नेपाल कि ,भारत और नेपाल का रिश्ता आम जनमानस में “रोटी बेटी” का है। तीन तरफ भारत से घिरा होने से कारण

समस्या यह कि दक्षिण एशिया में ही भारत कि प्रभुता को अन्य देश अस्वीकार कर रहे है।पुराने मित्र अब नए संभावनाएं तलाश रहे है। अब ये नन्हे मुन्हे देश संतुलन और व्यापार जैसे चीजों के आड़ में किसी भी देश का वर्चस्व मानने के मन में नहीं। परिस्थितियां इतनी विषम है कि आज शायद ही कोई देश भारत का परम हितैषी हो। बदलते वक्त के साथ इनलोगो ने भी अपने नए रंग दिखाने शुरू कर दिए है शुरुआत सबसे करीबी ‘रोटी-बेटी’ वाले रिश्तेदार नेपाल से करते है। नेपाल जो सन् 1947 में भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनने की संभावनाएं खोज रहा था वो आज भारत को आंख दिखा रहा है,दशकों के संघर्षशील राजनीति पंडितो को भारत के रूप में एक साझा दुश्मन देश मिल गया है,ऊपर से कम्युनिस्ट सरकार ने चीन कम्युनिस्ट पार्टी से अपने रिश्ते इस कदर बढ़ाए है की भारत को निगलते बन रहा है ना उगलते ही। चीनी एंबेसडर का नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को एक रखने कि कोशिशें देख कर कोई बुद्धिमान व्यक्ति नेपाल को स्वतंत्र देश नहीं कहेगा। भारत भले ही पशुपतिनाथ और गौतम बुद्ध के नाम पर सांझी विरासत और संस्कृति का बात करे लेकिन नेपाल अब इससे आगे बढ़ चुका है।अब ये बेटी सिर्फ रोटी से शांत नहीं होने वाली है।

बांग्लादेश में नए रूप में इस्लाम चरमपंथ के उभार ने वहां की हसीना सरकार को भारत के साथ अपने संबंध कम करने के लिए मजबुर किया है। कुछ दिनों पहले उच्च अधिकारी हर्ष वर्धन सिंघला का ढाका दौरा ये दिखा रहा है कि भारत के पास अब कुछ ज्यादा विकल्प बचे नहीं है।हसीना सरकार खुले तौर पे भारत के साथ दिखने से सकुचा रही है। और उससे भी ज्यादा चीन के नजदीकियां बढ़ा रही है। विपक्षी पार्टी पहले से ही भारत के मुखर विरोधी रही,वक़्त बदल रहा है अब दोस्त अपने दोस्तो से चंगुल से छूटकर आगे बढ़ जाना चाहते है।

मालदीव, भारतीय महासागर में सुदूर दक्षिण में स्थित यह मनमोहक द्वीपसमूह हमेशा से ही भारत का साथी रहा है तथा समुद्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक फायदा देता आया है भारतीय नौसेना को,परन्तु इसको भी चीनी नजर लग गई और पूरी तरह चीनी कर्ज में डूबे हुए है। परन्तु पिछली चुनाव में भारत समर्थक सरकार पुनर्स्थापित हुई है और रिश्तों एक बार फिर गर्मजोशी दिख रही है। इसी के पड़ोसी देश श्रीलंका की बात कर लेते है , थोड़ी दिनों के लिए मैत्रीपाला सरकार के आने से भारत की उस ओर से समस्याएं काम है थी लेकिन आम चुनाव जिस तरह राजपक्षे परिवार ने श्रीलंका पे एकाधिकार हासिल किया और चुनाव से पहले भारतीय उच्चायुक्त को जिस तरह चुनाव से दूर रहने को नसीहत मिली उसने काफी हद तक भारत की नाजुक स्थिति सबके सामने ला रखी है। गोया कि राजपक्षे सरकार के अबतक तमिल विरोधी कोई खास कदम नहीं उठाए है लेकिन इसके पूरे कयास लगाए जा रहे है।और उस समय भारत को बहुत संयम से काम लेना होगा।

इस तरह से बदलते युग में रिश्तों से अपेक्षाएं और ज़रूरतें भी बदल रही। उभरते विश्व अब कोई किसी के पीछे नहीं चलना चाहता है सबको अपने हिसाब से रणनीति बनानी है । आशा है कि एशिया का सुपरपावर कम से कम अपने पड़ोसियों को अपने पाले में रख पायेगा।

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