भिखारीनामा

तनिक न आवे गावे-बजावे, काहें दो लागल लोग के भावे!

भिखारी ठाकुर

जब भारत के राष्ट्रपति ने इस साल के पद्म पुरस्कारों को घोषणा कि तो उसमे बहुत बड़े बड़े नाम थे मसलन,जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो अबे से लेकर पुराने राजनीतिज्ञ रामविलास पासवान तक, लेकिन उसमे एक नाम सहसा आश्चर्यचकित करने वाला था ,वह नाम था रामचन्द्र मांझी।

कौन है ये रामचंद्र मांझी? इस सवाल का जवाब है कि वो एक कलाकार है जो अपने आप को औरतों के भेष में ढाल कर गाना बजाना करता है। लेकिन इसमें तो कोई पद्म श्री देने लायक बात नहीं हुई। तो असली बात ये है कि रामचन्द्र मांझी ,भोजपुरी के सेक्सपियर ,भारतमुनी भिखारी ठाकुर के मंडली के आखिरी जीवित सदस्य है। भिखारी ठाकुर भोजपुरी भाषा के संवाहक ,भोजपुरी के प्रणेता,जिनको शायद इतिहास में कभी वो जगह नहीं मिली जो उनकी थी,दुख की बात ये है उनको आज भोजपुरी समाज भी भूल चुका है। भिखारी ठाकुर का जन्म छपरा जिला में 1887 एक नाई परिवार में हुआ था। साधारण शिक्षा मिली पर मेधावी इतने की पूरी रामचरितमानस कंठस्थ कर ली। धीरे धीरे राम मंडली कि ओर झुकाव बढ़ता गया और अंततः फैसला कर लिया कि इसी क्षेत्र में काम करना है। और फिर जब काम किया को सितारे कि तरह चमके।

एक लेखक,नाटककार,कवि,कलाकार,गायक और बहुत से खूबियां से भरपूर थे भिखारी ठाकुर । उन्होंने उस समय के परिदृश्यों को यथार्थ रूप देते हुए कुछ अनमोल नाटकों की रचना कि जिनके सहारे आज भोजपुरी समाज और सिनेमा खड़ा है।उन्होंने समाज के हर बुराई को परिलक्षित करती नाटकों का मंचन किया ,सबसे प्रसिद्ध और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटक था ” विदेशिया ” । यह नाटक एक ऐसी स्त्री का दर्द बयां करता है जिसका पति उसे छोड़ पराई स्त्री से साथ विवाह कर लेता है ,” बेटी बेचवा ” एक असमान परिवारों के बीच विवाह के मुश्किलों को बानगी है वहीं ” बिधवा विलाप” जैसा कि नाम से साफ है एक विधवा की कहानी है जिसे क्रूर समाज को झेलना पड़ता है। उसी तरह “भाई बिरोध”,”ननद भौजाई” परिवार में पड़ रहे दरार और घर बंटवारे को लेकर है।
“गबरघिचोर” भिखारी ठाकुर का वह नाटक है, जिसको पढ़ने-देखने के बाद समीक्षकों ने उन्हें महान नाटककार बर्टोल्ट ब्रेष्ट के समक्ष खड़ा कर दिया. भिखारी ठाकुर ने समाज के हर बुराई को बड़े मार्मिक ढंग से पेश किया । अपने नाटक और हस्यो में समाज को शिक्षा देने की भी कोशिश कि। तू ही उन्हें भोजपुरी साहित्य और लोककला का शुत्रधर नहीं माना जाता उन्होंने अपने जीवन में लगभग 29 किताबे लिखी ।

आज जिस तरह भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन चुका है, उसका उद्गम स्थान भिखारी ठाकुर का मंच ही था।लबार के चटकीले व्यंग सुन दर्शक पेट पकड़ हसते थे। चटक लाल रंग की सारी पहने, लाल बिंदी लगाए , घूंघट किए मर्द जब औरत बनते थे और रंगमंच के संगीत पर ठुमकते थे तो भिखारी ठाकुर के नाटकों को चार कोश के लोग देखने आते थे। आज वो कला शैली मरण शय्या पे ही ,समाज में उसे दुत्कारा जाने लगा है, कारण है अब उसमे मुख्य रूप से अश्लीलता परोसना । सरकारी ने कभी इस कला को उचित सम्मान नहीं दिया पर जब 2017 में रामचंद्र मांझी को संगीत अकादमी पुरस्कार मिला को लगा कि अब इनलोगो को भी सम्मान मिलेगा और फिर भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री मिला। पुरस्कार पाकर मांझी अपने आप को कृतघ्न पाते है। लेकिन ये सम्मान तो चौंक चौराहे पे बैठे भिखारी के गीत गाने वालों को भी है।

भोजपुरी वर्ग जो इस युग में भी आत्मग्लानि का मरीज है। जिसे आज भी अपने चीजों को अपनाने में शर्म महसूस होती है। जो शायद भारत भर में सबसे ज्यादा क्षेत्रीय उन्माद के भुक्तभोगी है। उसे अब खड़ा होके भिखारी ठाकुर जैसे रत्नों को अपनाना होगा। भोजपुरी भाषा को गर्व से अपनाना होगा। और फिर स्वयं को सबके समकक्ष लाना होगा। गर्व से बिहारी और भोजपुरी होने का बखान करना होगा , यह पद्म पुरस्कार सिर्फ रामचंद्र मांझी ठाकुर नहीं बल्कि पूरे समाज के मर रहे धरोहर को एक सम्मान है।

नाओं कांच बा, पर सांच बा

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

Create your website with WordPress.com
Get started
%d bloggers like this: