भिखारीनामा

तनिक न आवे गावे-बजावे, काहें दो लागल लोग के भावे!

भिखारी ठाकुर

जब भारत के राष्ट्रपति ने इस साल के पद्म पुरस्कारों को घोषणा कि तो उसमे बहुत बड़े बड़े नाम थे मसलन,जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो अबे से लेकर पुराने राजनीतिज्ञ रामविलास पासवान तक, लेकिन उसमे एक नाम सहसा आश्चर्यचकित करने वाला था ,वह नाम था रामचन्द्र मांझी।

कौन है ये रामचंद्र मांझी? इस सवाल का जवाब है कि वो एक कलाकार है जो अपने आप को औरतों के भेष में ढाल कर गाना बजाना करता है। लेकिन इसमें तो कोई पद्म श्री देने लायक बात नहीं हुई। तो असली बात ये है कि रामचन्द्र मांझी ,भोजपुरी के सेक्सपियर ,भारतमुनी भिखारी ठाकुर के मंडली के आखिरी जीवित सदस्य है। भिखारी ठाकुर भोजपुरी भाषा के संवाहक ,भोजपुरी के प्रणेता,जिनको शायद इतिहास में कभी वो जगह नहीं मिली जो उनकी थी,दुख की बात ये है उनको आज भोजपुरी समाज भी भूल चुका है। भिखारी ठाकुर का जन्म छपरा जिला में 1887 एक नाई परिवार में हुआ था। साधारण शिक्षा मिली पर मेधावी इतने की पूरी रामचरितमानस कंठस्थ कर ली। धीरे धीरे राम मंडली कि ओर झुकाव बढ़ता गया और अंततः फैसला कर लिया कि इसी क्षेत्र में काम करना है। और फिर जब काम किया को सितारे कि तरह चमके।

एक लेखक,नाटककार,कवि,कलाकार,गायक और बहुत से खूबियां से भरपूर थे भिखारी ठाकुर । उन्होंने उस समय के परिदृश्यों को यथार्थ रूप देते हुए कुछ अनमोल नाटकों की रचना कि जिनके सहारे आज भोजपुरी समाज और सिनेमा खड़ा है।उन्होंने समाज के हर बुराई को परिलक्षित करती नाटकों का मंचन किया ,सबसे प्रसिद्ध और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटक था ” विदेशिया ” । यह नाटक एक ऐसी स्त्री का दर्द बयां करता है जिसका पति उसे छोड़ पराई स्त्री से साथ विवाह कर लेता है ,” बेटी बेचवा ” एक असमान परिवारों के बीच विवाह के मुश्किलों को बानगी है वहीं ” बिधवा विलाप” जैसा कि नाम से साफ है एक विधवा की कहानी है जिसे क्रूर समाज को झेलना पड़ता है। उसी तरह “भाई बिरोध”,”ननद भौजाई” परिवार में पड़ रहे दरार और घर बंटवारे को लेकर है।
“गबरघिचोर” भिखारी ठाकुर का वह नाटक है, जिसको पढ़ने-देखने के बाद समीक्षकों ने उन्हें महान नाटककार बर्टोल्ट ब्रेष्ट के समक्ष खड़ा कर दिया. भिखारी ठाकुर ने समाज के हर बुराई को बड़े मार्मिक ढंग से पेश किया । अपने नाटक और हस्यो में समाज को शिक्षा देने की भी कोशिश कि। तू ही उन्हें भोजपुरी साहित्य और लोककला का शुत्रधर नहीं माना जाता उन्होंने अपने जीवन में लगभग 29 किताबे लिखी ।

आज जिस तरह भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन चुका है, उसका उद्गम स्थान भिखारी ठाकुर का मंच ही था।लबार के चटकीले व्यंग सुन दर्शक पेट पकड़ हसते थे। चटक लाल रंग की सारी पहने, लाल बिंदी लगाए , घूंघट किए मर्द जब औरत बनते थे और रंगमंच के संगीत पर ठुमकते थे तो भिखारी ठाकुर के नाटकों को चार कोश के लोग देखने आते थे। आज वो कला शैली मरण शय्या पे ही ,समाज में उसे दुत्कारा जाने लगा है, कारण है अब उसमे मुख्य रूप से अश्लीलता परोसना । सरकारी ने कभी इस कला को उचित सम्मान नहीं दिया पर जब 2017 में रामचंद्र मांझी को संगीत अकादमी पुरस्कार मिला को लगा कि अब इनलोगो को भी सम्मान मिलेगा और फिर भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री मिला। पुरस्कार पाकर मांझी अपने आप को कृतघ्न पाते है। लेकिन ये सम्मान तो चौंक चौराहे पे बैठे भिखारी के गीत गाने वालों को भी है।

भोजपुरी वर्ग जो इस युग में भी आत्मग्लानि का मरीज है। जिसे आज भी अपने चीजों को अपनाने में शर्म महसूस होती है। जो शायद भारत भर में सबसे ज्यादा क्षेत्रीय उन्माद के भुक्तभोगी है। उसे अब खड़ा होके भिखारी ठाकुर जैसे रत्नों को अपनाना होगा। भोजपुरी भाषा को गर्व से अपनाना होगा। और फिर स्वयं को सबके समकक्ष लाना होगा। गर्व से बिहारी और भोजपुरी होने का बखान करना होगा , यह पद्म पुरस्कार सिर्फ रामचंद्र मांझी ठाकुर नहीं बल्कि पूरे समाज के मर रहे धरोहर को एक सम्मान है।

नाओं कांच बा, पर सांच बा

विश्व के बदलते अयाम

19 वीं सदी के नवीन भारत ,विश्वपटल में छाप छोड़ता नया भारत,दुनिया के नई शक्तिओ का अगुआ भारत,एशिया का नया शेर भारत। परन्तु क्या हम कुछ ज्यादा ही लालची  हो रहे है? भारत का विश्व के अन्य राष्ट्रो के साथ रिश्तों से इनपे क्या प्रभाव पड़ता है। चलिए एक आकलन करते है।

शुरुआत करते है अपने पड़ोसियों से। किसी जमाने में ये देश ब्रिटिश राज का हिस्सा हुए करते थे। सर्वप्रथम बात नेपाल कि ,भारत और नेपाल का रिश्ता आम जनमानस में “रोटी बेटी” का है। तीन तरफ भारत से घिरा होने से कारण

समस्या यह कि दक्षिण एशिया में ही भारत कि प्रभुता को अन्य देश अस्वीकार कर रहे है।पुराने मित्र अब नए संभावनाएं तलाश रहे है। अब ये नन्हे मुन्हे देश संतुलन और व्यापार जैसे चीजों के आड़ में किसी भी देश का वर्चस्व मानने के मन में नहीं। परिस्थितियां इतनी विषम है कि आज शायद ही कोई देश भारत का परम हितैषी हो। बदलते वक्त के साथ इनलोगो ने भी अपने नए रंग दिखाने शुरू कर दिए है शुरुआत सबसे करीबी ‘रोटी-बेटी’ वाले रिश्तेदार नेपाल से करते है। नेपाल जो सन् 1947 में भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनने की संभावनाएं खोज रहा था वो आज भारत को आंख दिखा रहा है,दशकों के संघर्षशील राजनीति पंडितो को भारत के रूप में एक साझा दुश्मन देश मिल गया है,ऊपर से कम्युनिस्ट सरकार ने चीन कम्युनिस्ट पार्टी से अपने रिश्ते इस कदर बढ़ाए है की भारत को निगलते बन रहा है ना उगलते ही। चीनी एंबेसडर का नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को एक रखने कि कोशिशें देख कर कोई बुद्धिमान व्यक्ति नेपाल को स्वतंत्र देश नहीं कहेगा। भारत भले ही पशुपतिनाथ और गौतम बुद्ध के नाम पर सांझी विरासत और संस्कृति का बात करे लेकिन नेपाल अब इससे आगे बढ़ चुका है।अब ये बेटी सिर्फ रोटी से शांत नहीं होने वाली है।

बांग्लादेश में नए रूप में इस्लाम चरमपंथ के उभार ने वहां की हसीना सरकार को भारत के साथ अपने संबंध कम करने के लिए मजबुर किया है। कुछ दिनों पहले उच्च अधिकारी हर्ष वर्धन सिंघला का ढाका दौरा ये दिखा रहा है कि भारत के पास अब कुछ ज्यादा विकल्प बचे नहीं है।हसीना सरकार खुले तौर पे भारत के साथ दिखने से सकुचा रही है। और उससे भी ज्यादा चीन के नजदीकियां बढ़ा रही है। विपक्षी पार्टी पहले से ही भारत के मुखर विरोधी रही,वक़्त बदल रहा है अब दोस्त अपने दोस्तो से चंगुल से छूटकर आगे बढ़ जाना चाहते है।

मालदीव, भारतीय महासागर में सुदूर दक्षिण में स्थित यह मनमोहक द्वीपसमूह हमेशा से ही भारत का साथी रहा है तथा समुद्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक फायदा देता आया है भारतीय नौसेना को,परन्तु इसको भी चीनी नजर लग गई और पूरी तरह चीनी कर्ज में डूबे हुए है। परन्तु पिछली चुनाव में भारत समर्थक सरकार पुनर्स्थापित हुई है और रिश्तों एक बार फिर गर्मजोशी दिख रही है। इसी के पड़ोसी देश श्रीलंका की बात कर लेते है , थोड़ी दिनों के लिए मैत्रीपाला सरकार के आने से भारत की उस ओर से समस्याएं काम है थी लेकिन आम चुनाव जिस तरह राजपक्षे परिवार ने श्रीलंका पे एकाधिकार हासिल किया और चुनाव से पहले भारतीय उच्चायुक्त को जिस तरह चुनाव से दूर रहने को नसीहत मिली उसने काफी हद तक भारत की नाजुक स्थिति सबके सामने ला रखी है। गोया कि राजपक्षे सरकार के अबतक तमिल विरोधी कोई खास कदम नहीं उठाए है लेकिन इसके पूरे कयास लगाए जा रहे है।और उस समय भारत को बहुत संयम से काम लेना होगा।

इस तरह से बदलते युग में रिश्तों से अपेक्षाएं और ज़रूरतें भी बदल रही। उभरते विश्व अब कोई किसी के पीछे नहीं चलना चाहता है सबको अपने हिसाब से रणनीति बनानी है । आशा है कि एशिया का सुपरपावर कम से कम अपने पड़ोसियों को अपने पाले में रख पायेगा।

Can we say now “let the Law to take it Course”

Do we are letting the law to take it’s course

Be it SSR case or Delhi riot case or Bhima koregaon case. While in SSR case we have seen that there is more media trail of accused and every possible way to malign his/her.That’s where youngsters like us stood tall and said Hey barking media please stop “Let the law take it Course” That was very bold and brave decision from our generation am proud of that. But do you really think a Protest is subversive to the society why we were hell bend to call the CAA protesters as subvert to Society they were only exercising there right . Normally in a society constituenting the rule of law we should let the investigation run But we are living in a world where the state, in partnership with the media, does not subscribe to this restraint. In case after case, it runs nightly media trials, destroying people’s lives and reputations. The state uses investigations, leaked evidence, chargesheets as pretexts for establishing narrative dominance and to intimidate. It is not interested in guilt and innocence but it interesting in demonstrating that it can destroy your life and impunity. Government and delhi police and working very hard to describe Delhi riot as an liberal Islamist and left planned genocide of a community really we the people are believing bcz of what we see in reports. Some of us will say that if there is Umar khalid it was offcourse not in nation interest but do you remember any judgement pronounce by Court in which he was found guilty !! No . It can declare you a terrorist a drug loader or Jail you under UAPA just like dr. Kafeel khan who was jailed for almost 6 months but when the Battle was in cour HC said that the prime facia used to capture Dr. Kafeel doesn’t instigate anyone for voilance but talks about unity and integrity , Non-voilance. But the media trail had already proved him a traitor and conspiracer. The main idea is to declare any critic of government subvert to the nation . The police had shifted it goal from investigation riots to making it look like any agenda of Left liberal and Islamist. First of all it was failure of police to not be able to stop riot for 48 hrs. Then it is not true that it was riot because they were protesting it was riot bcz some people were instigating it with Slogans Like “Goli maro Salo ko” It was riot bcz an Mp called all the protestors A potential “rapist” , it was riot bcz an ordinary leader of ruling gave then ultimatem to stop protesting in presence of police without any Authority and offcourse there are elements on other side also but a person from maharastra cannot instigate voilance in Delhi .Every person named in FIR from Prashant Bhusan, Dr. Salman khursid, pinjratod’s girls To umar khalid are from one side but there weren’t anyone from other side. As they were being sloughtered by these people but reports says that the minority section people were affected more than 70% but they are capturing only their critics to just show the country that Don’t you dare to speak. This modus operandi was perfected in the Bhima Koregaon cases. There also the focus became not on the event, but targeting alleged ideological foes like Anand Teltumbde or Sudha Bharadwaj. How we can make an example of you so other intellectuals dare not speak. The law should take its own course when the state is interested in law. But when the state is using law as an instrument of ideological and physical intimidation, the phrase “let the law take its own course” becomes a cover to subvert our constitutional values.

The Vanishing Vox Populi

There was a time whenever one would refer media and only news media or say people’s media would come to our mind. Well the news media still remains and social media also appeared but somewhere somehow people’s media is vanishing or already vanished. Television was a revolution when it came and with televised news. The visuals were testimony of their authencity. The need to read the newspaper to know news and spending 1-2hours behind that took backseat. And it was a luxury to have.

But the present form of television media is horrible. Media has its own power. As it called 4th pillar of democracy. The instant fame and disgrace. Never shy to called themselves self-proclaimed court who only delivers justice. And such is the power that now it has become just a power game. Again an social element turning into a business game.

For past 2 months I have not saw even a ½ hour segment of news on this so called savior of truth channels. And it’s not something by choice, but such is the toxicity in those news I can’t bear to hear them. I don’t know what type of journalism is this. Actually this all has pushback me to newspaper and DD news.

So there should be no guesses where this is heading. Yes the HOT #SSR case. Sushant was a great actor and a great human. Anyone who has watched him from beginning loved his success. And the sudden death spurred a small movement towards mental health which was expected under the circumstances. But we all cannot digest he died with depression. We needed a villain. Like every movie has. And we got it as Rhea Chakraborty. She was just perfect candidate. His last girlfriend, left him just before SSR died, his parents don’t liked her and if anything which was left to instigate it further was the FIR from his father.  And the director and producers (some media channels) were ever ready for this script. And a movie can’t be without mirch-masala. And it’s being telecast every day. And bumper TRP’s making it a hit.

Sorry if anybody getting a idea that I am sympathizing with her. But I am not. But at some point everyone must. At one side we are advocating about mental education and on the other side we are forcing another person to take the same steps. How do you think one is ever going cope up where every eyes sees you as guilty. As murderer. The way media persons treat her is just  inhuman. When you are advocating feminism then you should provide personal space to a girl. Who is still ACCUSED not yet proven guilty.

You raised a campaign for CBI inquiry. That was okay. Now if you have requested and trust them then let handle this case. And I am sure CBI and Court will give justice to SSR. There are bigger things to do. To question government. You ask government on the behalf of public. You should have raised the issue of SSC exams. You should have started campaign for that girl who was raped in an ambulance. But why would you. But they won’t provide you with bumper TRP’s right. And just like that people have lost their voice.

I hope someday journalism will recover and will reestablished itself as pillar of democracy. But for now they are not more than just Vultures.

I am the loath & might

I am in the heaven of Hells  with the chunks of  living dwells, I am the dimest star in the sea of bright, I am the ash in swoldling fire of wild , I am the contradiction on the head of poor I am the fear in heart of the rich , I am the wanned flower in the garth of blooming floret , I am no one in the sky of everyone . But One day I will born, One day I will Rise with the Bright ,on the ashes of light , in smiles of plight , bcz I am love in the world of loath and might

नया सवेरा

जीवन के प्याले में मैंने,अश्रु का विषपान किया हैं। बरसते नयनों में भी मैंने , सुबक सुबक कर गान किया है।। रिमझिम मौसम में भी मैंने सुना सा संसार देखा है। चढ़ रही अंधकार में मैंने, उग रहा भिनसार देखा है।। टूट हुए सितारों का मैंने अपमान किया है। इच्छा ना बताकर उन पर एहसान किया है।। बह रही सरिता में भी मैंने , ठहरा सा संसार देखा है। मर रहे जीवन में मैंने अशाओ का नवनिर्माण देखा है।। उगते सूरज से छा रहे अंधकार देखा है । और निशा में खूबसूरत चांद का बेढ़ांगा आकार देखा है।। –अभिषेक सिंह (अतीत के पन्नों से)

Dhoni and The Cry for Farewell Match

To associate a farewell match with Dhoni is something which is not suited to him. Because as person whoever have known him and as fans we have witnessed him for last fifteen years. We all know for A farewell match he won’t have ever asked or waited. His period of captaincy has taught us that one should ever be ready for spontaneous decisions from him and we should not be surprised at all by it. Likes of it are everywhere like his TEST RETIREMENT. Always emptying the centrestage for others and always handing over the trophy to youngsters. Never trying to take the limelight still be the reason of the limelight. It’s just not a habit it’s a legacy which MSD is leaving. And just like Dhoni bids adieu to international cricket.

A farewell match is a very big event and more importantly one of the most emotional event of sportspersons career. Many greats wants to bid adieu their respective beloved game in grand style. That final game getting honours from your teammates and opponents. A standing ovation from the audiences with chanting his name and giving that final farewell speech. Is something very fascinating. And many craves for it. And they truly deserves it. Because it’s their right to get farewell as they serve their country and this game.

But to show emotions is something very rare with our SKIPPER. And also MSD never craves for anything he has always earned whatever he ever wants. So honestly speaking should DHONI have waited for one last farewell match? My answer would be NO.

But I would still justify the cries of farewell match from fans. He has done and gave everything we all could ever asked for. But we as fans don’t deserve to remember our Magical Skipper in last of his blues getting run-out and seeing that crying face. A match that will haunt us for many years to come. We deserve the conqueror of the world cricket to bid adieu international cricket as a conqueror. We don’t want to remember that match as your last where took us so far yet couldn’t cross the line. We deserve to see that greatest finisher of all time in blues to finish one last time. We all deserve to shed tears to see you retire. #WEDESERVEONELASTFAREWELLMATCH. Because as they say “Universe deserves a HAPPY ENDING”. And that’s what we want for our cricketing universe. To get that happy ending.

Still I don’t think it’s possible. But will wish from eternity to HAPPEN.

भारत मतलब कौन? 🇮🇳

मानचित्र में जो मिलता है, नही देश भारत है। भू पर नहीं, मनों में ही बसा,कहीं शेष भारत है।” -दिनकर

जन गण मन भारत भाग्य विधाता। पर ये भारत कौन है ? क्या सिर्फ एक देश या एक राष्ट्र या एक बृहद परिवार या फिर लोगो के अंदर बसे भारतीयता का भौतिक रूप। हमारे पूर्वजों ने तरह तरह से भारत को परिभाषित करने की कोशिश की श्री नेहरू जी ने लिखा कि यहां के लोग ही वास्तव में भारत है,सावरकर जी ने लिखा कि इस भूमि को अपनाने वाला भारतीय है,गांधी जी ने कहा कि असली भारत गांव में है। पर क्या भारत की इतनी व्याख्या प्रयाप्त है?और क्या सबको स्वीकार्य है? चलिए भारत को जानने और समझने के लिए अथाह समुंदर में गोता लगाते है।

पंजाब का नौजवान मुंडा जब कर्नाटक के कन्नड से मिलता है तो उनमें लगभग कोई सामान्यता नहीं होती है,असम का कार्बी समुदाय जब छत्तीसगढ़ के भिलों से मिलता है तो क्या सामान्यता होती है दोनों में?भारत का हर क्षेत्र एक दूसरे से भिन्न है फिर इन्हें एक सूत्र में कौन पिरोता है? वो क्या है जो उत्तर भारत के लग्न को दक्षिण भारत के कल्याणम से जोड़ती है। वो क्या है जो भांगड़ा और ओडिसी को एक छत के नीचे लाती है। वो क्या है जो पहाड़ियों और तटीय लोगो को एक बनाती है, वो क्या है जो हमको आपसे जोड़ता है, ये सामाजिक एकता ,ये समरसता और ये अपनापन कहा से आया है। इन सबका उत्तर शायद भारत के इतिहास में छुपा है।

इसका जवाब कुछ हद तक इसमें निहित है कि भारत के पास अपना क्या है जिसपर उसको नाज़ है तथा जो बहुत मूल्यवान है।इस ओर नजर दौड़ाने पर जो चीज सबसे पहले हमारे समक्ष आती है वो है प्राचीन सिंधु-सरस्वती सभ्यता जो कि आज हमें पड़ोसी मुल्कों से बांटना पड़ रहा है। पृथ्वी पर मानव सभ्यता के चरम बिन्दु थी ये सभ्यता ,सिंधु नदी किनारे बसे इसी सभ्यता से हमें हमारी पहचान मिली जिसे आज हम गर्व से अपनाते है इसके तत्पश्चात हमारे पास जो सबसे अमूल्य चीज है वो हैं वेद और उपनिषद, महान ऋषि और मनिषिओ द्वारा रचित ये ज्ञान के भंडार का कोई विशेष उगदम स्थान नहीं है,ये तो पूरे भारतवर्ष में ये फैले महान आत्माओं के ज्ञान का संगम है। ये सबकी सांझी विरासत है। भारत के लोक आस्था और आम जन मानस के जीवन में जितना प्रभाव श्री मर्यादा पुरषोत्तम राम का है शायद उतना किसी का नहीं है।फिर आती है जीवनदायिनी गंगा जिसका गुजरात में भी उतना ही प्रताप है जितना उत्तरप्रदेश या कर्नाटक में।अन्य नदिया भी आस्था के केंद्र है। हमारे इतिहास के गहन अध्ययन से एक बात स्पष्ट होती है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम के तीन मुख्यबिंदू रहे बंगाल,पंजाब और गुजरात ,गौर करने की बात है कि ये तीनों क्षेत्र भारत के तीन कोने में है तथा एक दूजे से हर स्तर पे भिन्न है परन्तु उनका उद्देश्य पंजाब या गुजरात को आज़ाद कराना कभी नहीं रहा अपितु उनका उद्देश्य समस्त भारतभूमि को आज़ाद करना था।हमारे संस्कृति ही हमें एक बनाती है,सुदूर दक्षिण में बसे श्री रामेश्वर ज्योर्तिलिंग हो या उत्तर के पहाड़ों में केदारनाथ पूर्व में जग्गनाथ धाम हो या पश्चिम में सोमनाथ ये भारत के धार्मिक सरहदों पे स्थित है। जब सुदूर उत्तर भारत के घर में धार्मिक कार्यों में संकल्प करने के लिए कावेरी और गोदावरी नदियों का नाम मंत्रो में उच्चरित होता है तब भारत एक होकर जुड़ता है,जब मोक्षदायिका पुरियो में हरिद्वार से कांची और बनारस से द्वारका का ज़िक्र आता है तब भारत एक होता है। फिर जिस तरह से ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ भारत ने एक होंकर बुनियादी लड़ाई उसने एक फिर देश में एकता का भाव भर दिया अंत में जब भारत के संविधान में हम भारत के लोग लिखा गया तब भरत का भारत फिर से एक बार एक हो गया।कुछ तथाकथित इतिहासकार ये बताते है कि भारत तो सन् 1947 में बना उससे पहले इसका कोई अस्तित्व नहीं है, उन ताथातथिक विद्वानों को हमारे लोकसमता और धर्म के इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है। उनके लिए यही कहना भर उचित है की अगर भारत 1947 में बना तो कोलंबस और वास्को द गमा किस भारत के खोज में निकले थे?

लेख के अग्र भाग में उठाए गए सवालों का जवाब अब मिलने लगा है। भले ही पंजाबी और कन्नड में बहुत भिन्नता है लेकिन उनकी भारत रूपी चादर इन भिन्नता को ढक देती है। छत्तीसगढ़ के भिलो में और असम के कार्बी समुदायों ने साथ मिलकर ब्रितानी को यहां से भगाया है। भारत को एक भारत, भारत की सांझी विरासत बनाती है उसकी आस्था ,उसकी श्रद्धा बनाती है। यहां के लोगो की धर्म परायणता, यहां की नदिया,पहाड़े,गीत संगीत के प्रति श्रद्धा और प्रेम भाव एक बनाते है। भारत के लोगो को एक सूत्र में इनकी सांझी विरासत और स्वर्ण इतिहास पिरोती है तथा वर्तमान समय में इन मोतियों को एक माला में भारत के संविधान ने पिरोये रखा है। भारत के एक वृहद परिवार का सांझी संकृती और विरासत है।

वृद्धाश्रम बनते गांव (भाग 1)

“कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।”

श्री दिनकरजी कि ये कविता आज भी हिंदुस्तान कि दशा और दुर्दशा को भलीभांति हम सभी के मानस पटल पर उकेर देती है, आंखो के सामने हमारे देश की वो तस्वीर ला खड़ा करती है जिसे शायाद नए युग के भारत ने अपनाने से मना कर दिया है।मानो दुक्तार दिया हो। हमारे देश को विभिन्नताओं का देश कहा जाता है ,देश का पक्ष विपक्ष हर समय इन विभिन्नताओं को बचाने में लगा रहता है पर क्या हर विभिन्नताओं को बचाना जरूरी है मेरा आशय है आर्थिक असमनाता से, मै इसे जाती धर्म के आधार पे कदापि नहीं तोलूंगा क्यू की मुझे वोट नहीं चाहिए । हम सभी तो पता है की बनारस या पटना से चलने वाली ट्रेन में बैठे मुसाफिर किस नजर से सूरत और मुंबई को देखते है, वो गरीब, अधनंगे,कम पढ़ेलिखे लोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए पश्चिम भारत की ओर निकल पड़ते है। गुजरात और महाराष्ट्र के बड़े शहरों के बाहर एक रूम वाले कमरे में दसियो लाख लोग रहते है पर कोई इनकी सुद तक लेने वाला नहीं है। उनके पास आधारभूत सुविधाएं भी नहीं होती है तब आपका डिजिटल भारत कोने मै खड़ा हो कर आप पर हसॅं रहा होता है।

उनके उपर ध्यान ना देने का एक कारण ये भी है कि वो जहां रह रहे होते है वहां के मतदाता सूची में उनका नाम नहीं होता है और जहां नाम होता है वहां वो नहीं होते है फिर भला नेक और ईमानदार नेता उनका भलाई कैसे कर दें। दुनिया के सबसे बड़े चुनाव में उनका वोट नहीं देना कोई ज्यादा बड़ा समस्या नहीं लगता है क्यू की शायद उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती है। यूपी -बिहार ने देश को बहुत बड़ा राजनीतिक आंदोलन दिया, आंदोनकारियों में से कइयों ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक भी छलांग लगाई पर ये यूपी बिहार के लिए एक अभिशाप बन कर ही रहा की क्यू की यहां की राजनीति कभी जाती से ऊपर उठकर उद्योग और शिक्षा तक पहुंची ही नहीं, परिणामस्वरूप स्वास्थ्य,और शिक्षा का हाल बिकुल निम्न स्तर का हो गया और उद्योग की तो कल्पना करना भी पाप हो गया।

असहाय लोगो ने जब आँख उठाया तो पाया कि अब यहां गुज़र बशर करना भी बहुत कठिन है सो घर की रखवाली के लिए अपने बुजुर्गो को गांव में छोड़ कर चल दिए सपने नापने। दिल्ली मुंबई,पंजाब में वो सस्ते परिश्रम के पर्यायवाची बन गए ,देश को भी इससे काफी फायदा हुआ पर उन गरब परिश्रमी को आज भी दो वक़्त के रोटी के लिए घर बार छोड़ कर प्रदेश रहना पड़ रहा है,और नए जगहों पर भेदभाव तथा जिल्लत कि जिंदगी जीनी पड़ रही है ,त्योहारों पर घर जाने के लिए दस बार सोचना पड़ रहा है।

यूपी बिहार के गांव अब बॉलीवुड की गांव कि तरह नहीं रह गए है। अब गांव एक वृद्धाश्रम से लगते है। जहां हर घर की रखवाली के लिए वृद्ध लोग रह रहे है और सभी नौजवान अच्छी जीवन की खोज में पलायन कर चुके है। हमें विश्वगुरु भी बनना है लेकिन अबतक अपना घर भी नहीं संभला है, हमें गांवों को वृद्धाश्रम होने से बचाना होगा वरना कल को फिर कोरोना जैसी महामारी फैलेगी तो ये शहरी लोग किस गांव कि ओर भागेंगे ? (भाग 1)

𝐂𝐀𝐁(A boon for 𝐇𝐢𝐧𝐝𝐮𝐬) + NRC = A curse for 🇮🇳

“ If anyone is going to tell me that CAB & NRC are different thing then let me tell you that I am not Lord Tyrion|| to believe any queen Targaryen”


Not hidden by the UN and world that the situation of minorities is Pak has been deteriorating since the times of independence . After some halt it got overdrive as the hindutva politics made space in india and then demolition of Babri mosque worked as catalyst. Other named nation is Afghanistan one who is fighting civil war and terrorism since 3 decades certainly not able to protect there minorities. Third nation in row is Bangaldesh a real culprit before indepence of bangaldesh it was eastimated 22% of Hindus and a considerable amount of bhudhhist lived but now its around one third left although major hand was of pakistan. The prosecuted minorities of this countries certainly needs our help BUT do the prosecuted minorities of of our other neighbour nation didn’t need our help? Why a prosecuted minority from Srilanka, Nepal, Bhutan, Myanmar cannot make their way to India? People will argue that they have Islamic republic, they have bhudhhist countries to run , by going logic India is for Whom? ”A question for WE”. Do we real need this type of segregated world.
A more argued aspect is that a country fighting for job and rise in population can handle the injection of lakhs of people from nowhere who will compete with them for everything in country.
Talking about NRC, we have a live model of NRC in Assam where it was purely needed to safeguard the cultural and demography of the state which have got a blow after oppression of Pakistan’s on Bangladesh . For nation wide NRC assamNRC will be a role model, where a family of a former president of India had been left out from the list of national register of citizenship, The family of veteran had been left out who had fought for this land. Surely there can be two type of errors (1) A legitimate person left out (2) An illegitimate person makes way . We have to decide which is more grave surely error 2 can’t be resolved and our grippling principle of judiciary is that hundred of guilty can be left out but not one innocent should suffer. The estimated cost of Aasam NRC was around 1600 crore does our economy is ready for a nationwide NRC? We can be assure that there will not that much of error in India than of Assam but even 1% error will force carores of people Without place to live. Another Cons is that Is a poor illterate will be able show their document for his homeland to whom he had voted to protect the same HOMELAND.
We need to give prosecuted minorities citizenship although it was use to be given earlier But with time we need changes But do we really need NRC??
Hritik Singh

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